May 7, 2021

Aone Punjabi

Nidar, Nipakh, Nawi Soch

रसोई की शान पीतल के सुनहरी बर्तन हो रहे है गायब, और प्लास्टिक ने ले ली जगह..

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एक समय था जब रसोई की सजावट को पीतल के बर्तनों के रूप में जाना जाता था और जिस घर में बेटी होती थी टो  उसकी माँ विशेष रूप से उसकी शादी में दहेज के लिए पीतल के बर्तन एकत्र करती थी। लेकिन इस समय पीतल के बर्तन अब मार्केट से गायब होते जा रहे है आज हमारी टीम ने बर्तनों की दुकानों और देखा तो पीतल गायब मिला आज हम आपको उन कारीगरों से भी  मिलवा रहे हैं जो मोगा में पीतल के बर्तन बनाते हैं वही हमने कुछ घरो की रसोई में भी देखा की पीतल के बर्तनों की जगह अब स्टील और प्लास्टिक ने ले ली है कारी गर रमेश कहते हैं कि अब इसकी डिमांड बहुत कम हो गई है जिसके कारण पीतल के बर्तन बहुत कम बनते है कयोकी पीतल के बर्तनों की सम्भाल रखना बहुत जरुरी है इनमे ताम्बा और जिस्ट हों एके कारण यह काले पड़ने शुरू हो जाते है और इन बर्तनों  को कली करवाना भी जरुरी है और अब न ही इतन्र कारीगर है मोगा जिले में सिर्फ एक ही अब परिवार है जो यह धंधा करता है लेकिन उनको भी पेट भर रोटी नही मिलती कयोकी अब कोई न टो बर्तनों में कली करवाने आता है दूसरा पीतल के भाव भी बहुत बड गये है रमेश कुमार ने यह भी दावा किया पीतल के बर्तनों में बनी दाल या पीतल के बर्तनों में बनी चाय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्वाद अलग है, यह किसी भी तरह से शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता है और पीतल के बर्तनों में बना खाना सो बीमारियों को दूर करता है

वही दूकान दार खेम चाँद ने बतया की आज कल पीतल के बर्तन कोई नही खरीद करता कयोकी यह मेह्न्घा भी बहुत हो गया वही पीतल के बर्तन सफाई बहुत मनगटे है और पीतल के बर्तनों में बने खाने का जयका ही अलग होता है लेकिन आज कल सब स्टील और प्लास्टिक के बर्तनों को ही पसंद करते है कयोकी एक टो सस्ते है दूसरा सफाई भी जल्दी हो जाती है


महलाओ ने कहा की बचपन में पीतल की ग्लासी में दूध पिटे थे लेकिन अब तो कभी कोई बर्तन देखा भी नही लेकिन माँ बाप दादा दादी कहते होते थे की इनमे भोजन खाने और पकाने में इसका स्वाद ही अलग होता है और कोई बिमारी भी नही लगती  अब टो कभी कोई पीतल का बर्तन देखा नहीं हा काई बहुत पुराने परिवार है उनके घरो में शायद कोई एक आधा बर्तन मिल जाये लेकिन अब हमने कभी नही कोई बर्तन देखा शायद किसी किसी दूकान पर मिल जाते हो लेकिन आज कल टो स्टील और प्लास्टिक का ही चलन है

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