August 5, 2021

Aone Punjabi

Nidar, Nipakh, Nawi Soch

World Sparrow Day: स्पैरो और भारत के “स्पैरोमैन” की कहानी

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कभी घर-आंगन में चहकने वाली गौरैया बेशक मौजूदा वक्त में कम नजर आती हो, लेकिन दिल्ली में अभी इसने प्रजनन क्षमता नहीं खोई है।राजधानी की राज्य पक्षी को अगर रहने के लिए प्राकृतिक घरौंदा मिल जाए तो वह दोबारा दिल्ली की शान बन सकती है।गांवों के नजदीक विकसित यमुना बायो डायवर्सिटी पार्क के इर्द-गिर्द गौरैया की चहचहाहट से यह साबित होता है।

गांवों में पर्याप्त खाना मिलने और पार्क की रिहायश में उसने रहना स्वीकार कर लिया है। पिछले कुछ समय से इस पार्क की परिधि पर 40 से 50 गौरैया झुंड के रूप में नजर आ जाती हैं। पक्षी विशेषज्ञों का मानना है कि यमुना बायो डायवर्सिटी समेत दूसरे पार्कों में गौरैया की वापसी हो रही है, लेकिन यह इस बात काभी सुबूत है कि पर्यावास खत्म होने से इस चिड़िया ने दूसरे स्थानों पर दिखाई देना बंद कर दिया है।अगर गौरैया के रहने व खाने का अनुकूल माहौल मिले तो दोबारा दिल्ली में उसकी चहचहाहट सुनी जा सकती है। 

यमुना बायो डायवर्सिटी पार्क के नजदीक तीन गांव हैं, जगतपुर, संगम विहार व बाबा कालोनी।बड़ी संख्या में गौरैया ने गांव व पार्क की सीमा पर आशियाना बना रखा है। गांव में उन्हें खाना मिल जाता है और पार्क की परिधि पर रहने लायक जगह। इस से उनकी आबादी तेजी से बढ़ी है। इस वक्त वहां 40 से 50 चिड़िया झुंड में भी देखी जाती हैं। दिलचस्प यह है कि गौरैया पार्क के बीच में नहीं दिखती।विशेषज्ञ मानते हैं कि घने जंगल को गौरैया आसानी से स्वीकार नहीं करती है। तिलपत और अरावली के पार्क की भी यही कहानी है।

इंसानों की दोस्त है यह नन्हीं चिड़िया

विशेषज्ञों का कहना है कि गौरैया इंसानों की दोस्त भी है।घरों के आसपास रहने की वजह से यह उन नुकसानदेह कीट-पतंगों को अपने बच्चों के भोजन के तौर पर इस्तेमाल करती थी, जिनका इस वक्त प्रकोप इंसानों पर भारी पड़ता है। कीड़े खाने की आदत से इसे किसान मित्र पक्षी भी कहा जाता है।अनाज के दाने, जमीन में बिखरे दाने भी यह खाती है। मजेदार बात यह कि खेतों में डाले गए बीजों को चुगकर यह खेती को नुकसान भी नहीं पहुंचाती।यह घरों से बाहर फेंके गए कूड़े-करकट में भी अपना आहार ढूंढती है।

दिल्ली की है राज्य पक्षी

दिल्ली सरकार ने गौरैया के संरक्षण के लिए इसे राज्य पक्षी का दर्जा दे रखा है। सरकार की कोशिश है कि गौरैया को फिर से दिल्ली में वापस लाया जाए। वैज्ञानिकों का मानना है कि गौरैया की 40 से ज्यादा प्रजातियां हैं, लेकिन शहरी जीवन में आए बदलावों से इनकी संख्या में 80 फीसदी तक कम हुई है।

अक्सर झुंड में रहती है

गौरैया अमूमन झुंड में रहती है। भोजन की तलाश में यह 2 से 5 मील तक चली जाती है। यह घोंसला बनाने के लिए मानव निर्मित एकांत स्थानों या दरारों, पुराने मकानों का बरामदा, बगीचों की तलाश करती है। अक्सर यह अपना घोंसला मानव आबादी के निकट ही बनाती हैं। इनके अंडे अलग-अलग आकार के होते हैं। अंडे को मादा गौरैया सेती है। गौरैया की अंडा सेने की अवधि 10-12 दिनों की होती है, जो सारी चिड़ियों की अंडे सेने की अवधि में सबसे कम है।

हरसाल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस (World Sparrow Day) मनाते हैं। तेजी से कम होती जा रही इस नन्ही चिड़िया को बचाए रखने के लिए नेचर फॉरेवर सोसायटी फॉर इंडिया (NFSI) ने इस दिन को मनाने की शुरुआत की, जो 50 से ज्यादा देशों में मनाया जा रहा है।वैसे इन सारी कोशिशों के बीच कई निजी कोशिशें भी हैं, जो गौरेया को सहेज रही हैं।

जगत किंखाबवाला ऐसा ही एक नाम है, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘स्पैरो मैन’ कहा था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में इस ‘स्पैरो मैन’ का जिक्र किया था। 65 बरस का ये स्पैरो मैन कहता है- गौरैया को ज्यादा कुछ नहीं चाहिए, बस खुली खिड़कियां, मिट्टी के सकोरे में पानी और चावल के टूटे दाने।आटे की लोइयां रख दें तो दावत समझिए। वे अपनी कहानी कुछ यूं सुनाते हैं-

हम बाहर जा रहे थे। कार आधा रास्ता तय कर चुकी, तभी मुझे खुटका-साहुआ। बिटिया से पूछा- ‘तुमने खिड़की बंद तो नहीं कर दी!’ ‘हां’। ये बोलने के साथ ही उसका चेहरा कुम्हला गया था।हम तुरंत वापस लौटे।घर पहुंचे तो देखा- गौरैया का जोड़ा खिड़की के बाहर इंतजार में था। एक चिड़िया रह-रहकर खिड़की के कांच पर चोंच मारती।अंदर पहुंचकर मैंने तमाम खिड़कियां खोल दीं। जोड़ा सांय से अंदर आया और अपने बच्चों को दाना देने लगा। चहचहाहट से घर भर गया था। उसके बाद खिड़कियां कभी बंद नहीं हुईं।

गर्मियों में नानी के घर जाते तो रात में आंगन में सोते। खूब अच्छी तरह से लिपा हुआ लंबा-चौड़ा आंगन, जहां कई पेड़ होते।उन्हीं के इर्द-गिर्द चारपाई बिछती।सुबह एक साथ कई आवाजों से नींद खुलती। बड़ों की बातों, मां-मौसियों की हंसी, रसोई की खटर-पटर और गौरैया की आवाज।किसी पंक्षी को सबसे पहले और सबसे करीब से जाना तो वो है गौरैया। दिनभर आंगन में उनकी चहचहाहट गूंजती।
वक्त बीता। मैं कॉर्पोरेट जगत का हिस्सा बन चुका था। दिन मीटिंग्स में बीतता।रात उनकी तैयारियों में।अहमदाबाद में अपना घर सजाया। घर में खूब पेड़-पौधे भी लगाए, तब भी कोई कमी थी जो खटकती थी। सोचता, फिर बिसर जाता। काम के सिलसिले में एक रोज सफर पर था।सफर में ही एक मैगजीन दिखी। उसके कवर पर एक चिड़िया चहक रही थी।घोंसले में मुंह खोले छोटे-छोटे बच्चे एक-दूसरे से चोंच लड़ा रहे थे। देखते ही मैगजीन मैंने लपक कर उठाली। आर्टिकल पढ़ना शुरू किया।वो गायब होती गौरैया के बारे में था। सीने पर जैसे किसी ने पूरी ताकत से मुक्का मारा हो। तो ये चीज ‘मिसिंग’ है- मेरे बगीचे से, मेरे बच्चों के बचपन से और मेरी जिंदगी से।

मैं गौरैया को घर बुलाने की तैयारी करने लगा। मैंने गत्तों से घोंसला बनाया। उस पर रंग किया। बच्चे देख रहे थे कि पापा ऑफिस का काम छोड़कर गत्ते-रंग लिए बैठे हैं। उन्हें भी मजा आ रहा था। हमने मिशन- गौरैया शुरू किया। मिट्टी के सकोरे लाए गए, उन पर दाना-पानी रखा। हम रोज सुबह आंखें खोलते और सब से पहले बगीचे का जायजा लेते। बचपन मानो लौट आया था। बस, गौरैया का आना बाकी था।एक रोज तड़के ही उठ गया। देखा तो गौरैया के कई जोड़े बगीचे में थे। मैं बिना कोई खटका किए देखता रहा और लौट आया। जोड़े बढ़ते गए। अब मेरे बगीचे में अलग-अलग मौसमों में लगभग 26 तरह के पंक्षी आते हैं।

गौरैया गायब हो रही है! क्योंकि उसे घोंसला बनाना नहीं आता। वो बसने के लिए हमेशा किसी संद (कोने) की खोज में रहती है।जैसे घर का वेंटिलेटर या कोई ऐसा कोना, जहां आहटें कम से कम हों।

उसी जगह ये कुछ फूस-तिनके रख देती है और उसे ही अपना घर मान लेती है। अब अपार्टमेंट होते हैं। कोनों की गुंजाइश कम से कम। चौकोर-आयताकार डिब्बों की शक्ल में बने घरों में गौरैया का घर खो गया है। कहीं अगर वो फूस-तिनके रखने की गुस्ताखी कर भी ले तो तुरंत वो ‘कचरा’ डस्टबिन में चला जाता है। काफी कुछ पढ़ा। कुछ अपने ही बगीचे में आ रहे पंक्षियों को देख-देखकर समझा।

साल 2008 से स्कूलों में जाकर वर्कशॉप लेने लगा। बच्चों को गत्ते के बेकार डिब्बों को तोड़-मोड़कर घोंसला बनाना सिखाता। सब मिलकर उन्हें रंग-रोगन करते। उन्हें बताता कि गौरैया का होना हमारे लिए कितना जरूरी है। धीरे-धीरे बच्चे और फिर बड़े भी जुड़ने लगे।स्कूल- कॉलेज से होता हुआ ये सिलसिला बढ़ता चला गया। अब तो ऑनलाइन भी घोंसले मंगाए जा सकते हैं। हालांकि मेरा मानना है कि घर पर ही घोंसला तैयार करना सबसे बढ़िया है। हमारे आसपास कोई भी चीज निकम्मी नहीं है। बच्चों से कहता हूं कि अपनी कल्पना को छुट्टा छोड़दो और फिर घोंसला सजाओ।

जगत किंकबवाला एक पर्यावरण संरक्षणवादी और सीएसआर कंसल्टेंट हैं, जो स्ट्रेटेजिक प्लानिंग, बिजनेस ऑपरेशंस, कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी और डॉक्यूमेंटेशन में 37 साल के कार्य अनुभव के साथ काम करते हैं।उन्होंने महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता के विषयों में सामाजिक कारणों के लिए भी काम किया है। उन्होंने सीएसआर परियोजनाओं के डिजाइन और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।उन्होंने अपना अधिकांश जीवन पर्यावरण के संरक्षण और संरक्षण और विशेष रूप से गौरैया पक्षी को समर्पित किया है। उन्हें भारत के “स्पैरो मैन” के रूप में जाना जाता है।वह एक दशक से अभियान चला रहे हैं और उन्हें गौरैया के उद्धारकर्ता के रूप में जाना जाता है।वह पर्यावरण के संरक्षण के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए दुनिया भर में कार्यशालाएं आयोजित करते हैं। उन्होंने एक पुस्तक “सेव द स्पैरो” भी प्रकाशित की है और विशेष रूप से सामान्य रूप से पर्यावरण और पक्षियों के लिए उनके योगदान के लिए माननीय पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा प्रशंसा की गई है।

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